हिंदी शायरियाँ .........
दिलों की डोर को बांधते -बांधते
कई अरसे हैं बीत गए
सबके दिल को जोड़ते -जोडते
जाने कब खुद ही टूट गए...... .
जाने कब खुद ही टूट गए...... .
शिकायत है लोग को की वक्त नहीं हमारे पास
शिकवे तो हमें भी हैं उनसे
जो हैं दिल के पास......
आदत सी हो गयी है
कड़वाहट को सहने की
अब आवाज़ भी नहीं आती
दिल के टूटने की.....


No comments:
Post a Comment